भारत में दो कर व्यवस्थाएँ
आयकर में दो विकल्प हैं: नई व्यवस्था, जिसमें स्लैब की दरें कम हैं पर 80C, HRA जैसी ज़्यादातर कटौतियाँ नहीं मिलतीं, और पुरानी व्यवस्था, जिसमें ऊँची दरें हैं पर कई कटौतियाँ मिलती हैं। वेतनभोगी हर साल अपना विकल्प चुन सकते हैं, इसलिए दोनों का हिसाब लगाना समझदारी है।
टैक्स कैसे निकलता है?
- कर योग्य आय = कुल आय − स्टैंडर्ड डिडक्शन − (पुरानी व्यवस्था में) कटौतियाँ।
- हर स्लैब की रकम पर उसी स्लैब की दर लगती है, पूरी आय पर एक दर नहीं।
- धारा 87A का रिबेट सीमा तक कर योग्य आय पर टैक्स शून्य कर देता है। नई व्यवस्था में सीमा से थोड़ा ऊपर मार्जिनल राहत मिलती है ताकि टैक्स आय के अंतर से ज़्यादा न हो।
- अंत में टैक्स पर 4% हेल्थ एंड एजुकेशन सेस जुड़ता है।
उदाहरण
नई व्यवस्था, 15 लाख रुपये वेतन, 75,000 रुपये स्टैंडर्ड डिडक्शन के बाद कर योग्य आय 14.25 लाख रुपये। स्लैब के अनुसार टैक्स: 4-8 लाख पर 5% = 20,000; 8-12 लाख पर 10% = 40,000; 12-14.25 लाख पर 15% = 33,750; कुल 93,750 रुपये। इस पर 4% सेस 3,750 रुपये जोड़ने पर कुल टैक्स 97,500 रुपये बनता है।
स्लैब खुद क्यों बदलें?
सरकार बजट में स्लैब, रिबेट और स्टैंडर्ड डिडक्शन बदलती रहती है। इसलिए हमने इन्हें संपादित योग्य रखा है और खाली छोड़ने पर वित्त वर्ष 2025-26 के मान लगते हैं। किसी और साल के लिए, या नई घोषणा के बाद, आयकर विभाग की वेबसाइट से सही सीमाएँ देखकर यहाँ भर दें।
सीमाएँ
यह कैलकुलेटर एक अनुमान देता है। इसमें सरचार्ज, पूँजीगत लाभ, विशेष दर वाली आय, 60 वर्ष से ऊपर की अलग छूट और विदेशी आय शामिल नहीं हैं। रिटर्न भरने से पहले किसी चार्टर्ड अकाउंटेंट से सलाह लें या आयकर विभाग का आधिकारिक कैलकुलेटर देखें।